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Jharkhand News : आठ साल में बालू घाटों से 11,175 करोड़ के राजस्व का नुकसान

Ranchi News : राज्य में सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कैटेगरी टू के 444 बालू घाट चिह्नित किए गए थे. शुरुआत में इनके संचालन की जिम्मेदारी झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) को दी गई थी. हालांकि, सभी चिह्नित घाटों का संचालन शुरू नहीं हो सका. इसके बाद सरकार ने पुरानी सैंड माइनिंग पॉलिसी को निरस्त कर 15 अगस्त 2025 को नई बालू खनन नियमावली लागू की.
 
बालू घाटा
  • 2017 से 2025 के बीच सीमित बालू घाटों का हुआ संचालन, हर साल 200 करोड़ सीएफटी खपत का अनुमान अकलन
  • 444 बालू घाट चिह्नित होने के बावजूद पूरी क्षमता से नहीं हुआ संचालन
  • सीटीई, सीटीओ और पर्यावरणीय स्वीकृति बनी बड़ी बाधा

Ranchi News : झारखंड में बालू घाट राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत बन सकते हैं. इसके बावजूद पिछले आठ वर्षों में राज्य सरकार बालू घाटों से अपेक्षित राजस्व हासिल नहीं कर सकी. वर्ष 2017 से 2025 के बीच बालू घाटों का संचालन सीमित रहने के कारण राज्य को करीब 11,175 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में बालू घाटों से सरकार को महज 20 से 25 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ.

 

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राज्य में सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कैटेगरी टू के 444 बालू घाट चिह्नित किए गए थे. शुरुआत में इनके संचालन की जिम्मेदारी झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) को दी गई थी. हालांकि, सभी चिह्नित घाटों का संचालन शुरू नहीं हो सका. इसके बाद सरकार ने पुरानी सैंड माइनिंग पॉलिसी को निरस्त कर 15 अगस्त 2025 को नई बालू खनन नियमावली लागू की. नई व्यवस्था में जिला स्तर पर उपायुक्त की अध्यक्षता वाली समिति को बालू घाटों की नीलामी, बिक्री और संचालन की जिम्मेदारी दी गई.

 

मिली जानकारी के अनुसार, वर्तमान व्यवस्था के तहत 310 बालू घाटों की नीलामी हो चुकी है. वहीं, 14 घाटों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़ी प्रक्रिया पूरी हुई है. मानसून के दौरान राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के तहत बालू खनन पर रोक रहती है. विभाग ने सभी जिलों को आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त कर 15 अक्टूबर के बाद घाटों का संचालन शुरू करने का निर्देश दिया था.

 

पलामू और लोहरदगा जिला में घाटों की निलामी की प्रकिया चल रही है. हालांकि, स्वीकृतियों और अन्य प्रक्रियाओं में देरी के कारण सभी घाटों का संचालन अब भी चुनौती बना हुआ है.

 

पर्यावरणीय स्वीकृति और ग्रामसभा की मंजूरी बड़ी बाधा

बालू घाटों के संचालन के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति, कंसेंट टू एस्टैब्लिश (सीटीई) और कंसेंट टू ऑपरेट (सीटीओ) जरूरी हैं. पांच हेक्टेयर से बड़े घाटों के लिए राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) से पर्यावरणीय स्वीकृति के साथ ग्रामसभा की मंजूरी और जनसुनवाई जैसी प्रक्रियाएं भी आवश्यक हैं. पांच हेक्टेयर से छोटे घाटों के लिए भी निर्धारित नियमों के अनुसार ग्रामसभा का अनुमोदन जरूरी है.

 

वर्ष 2021 में जेएसएमडीसी को 21 बालू घाटों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति मिली थी. इसके अलावा, 35 घाटों के लिए स्वीकृति लेने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. इसके बावजूद 2017 से 2025 के बीच अलग-अलग वर्षों में सीमित संख्या में ही घाट संचालित हो सके.

 

हर साल 200 करोड़ सीएफटी बालू की खपत का अनुमान

जानकारो के अनुसार, राज्य में सरकारी और गैर सरकारी निर्माण कार्यों के लिए प्रतिवर्ष करीब 200 करोड़ सीएफटी बालू की खपत का अनुमान लगाया जाता है. वर्ष 2018-19 में तीन, 2019-20 में 16, 2020-21 में 15, 2021-22 में 12, 2022-23 में 10, 2023-24 में 14 और 2024-25 में करीब नौ बालू घाटों का संचालन हुआ.

 

उपलब्ध अनुमान के मुताबिक, संबंधित अवधि में प्रति सीएफटी आठ रुपये की दर से राजस्व वसूली होती, तो सरकार को बड़ी रकम मिल सकती थी. हालांकि, वास्तविक राजस्व संग्रह इस संभावित राशि से काफी कम रहा. इस अंतर को बालू घाटों के सीमित संचालन और वैधानिक प्रक्रियाओं में देरी और जिला के उपायुक्त द्वारा वेंडर के लीज एग्रीमेट नहीं करना भी बालू घाटों के संचलान में देरी का कारण बन रहा है.

 

दूसरे राज्यों से बालू मंगाने की मजबूरी

झारखंड में पर्याप्त बालू घाटों का संचालन नहीं होने का असर सरकारी निर्माण योजनाओं पर भी पड़ा. कई ठेकेदारों को दूसरे राज्यों से बालू मंगाना पड़ा या वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ा. दूसरे राज्यों के चालान और जेएसएमडीसी के सीमित संचालित घाटों से उपलब्ध बालू के आधार पर निर्माण कार्यों के बिलों का भुगतान होता रहा.

 

इस स्थिति में राज्य के भीतर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन से राजस्व सृजन की संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल सका. अब नई नियमावली के तहत नीलाम किए गए घाटों का नियमित संचालन, पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया में तेजी और अवैध खनन पर नियंत्रण जैसे मामले से राज्य सरकार आपना राजस्व संग्रह में बढोतरी कर सकती है. 

 

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