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Koderma : शिक्षक के निलंबन पर सड़क पर उतरीं छात्राएं, शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर सवाल

Ranchi News : मामला केवल छात्राओं के विरोध तक सीमित नहीं है. जिले के कुछ अन्य शिक्षकों ने भी नाम नहीं छापने की शर्त पर जिला शिक्षा कार्यालय की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि कार्यालय में शिक्षकों का भयादोहन किया जाता है.
 
शिक्षक के साथ छात्राएं
  • बच्चे प्रशासन चलाना नहीं सिखाएंगे- जिला शिक्षा पदाधिकारी 

Ranchi News : सरकारी स्कूलों में अक्सर संसाधनों की कमी, शिक्षकों की अनुपस्थिति और बदहाल शैक्षणिक व्यवस्था की खबरें सामने आती हैं. लेकिन कोडरमा में एक अलग तस्वीर देखने को मिली. यहां छात्राएं अपने प्रभारी प्राचार्य के निलंबन के विरोध में सड़क पर उतर आईं. जिन बच्चों के हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए थीं, वे अपने शिक्षक के समर्थन में आवाज बुलंद कर रही थीं.

 

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छात्राओं का यह विरोध केवल एक शिक्षक को बचाने की मांग नहीं था, बल्कि उनके और विद्यालय के बीच बने भावनात्मक रिश्ते की भी झलक था. बासोडीह के बाद सीडी गर्ल्स प्लस टू हाई स्कूल की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा विभाग बच्चों की भावनाओं और विद्यालय में शिक्षकों के योगदान को समझने का प्रयास कर रहा है?

 

बुधवार को प्रभारी प्राचार्य शशिभूषण कुमार के निलंबन की सूचना मिलते ही विद्यालय में विरोध शुरू हो गया. बड़ी संख्या में छात्राएं कक्षाओं से बाहर निकल आईं. उन्होंने निलंबन के फैसले को अनुचित बताते हुए इसे वापस लेने और शशिभूषण कुमार को फिर से विद्यालय में पदस्थापित करने की मांग की. स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई, जब प्रभारी प्राचार्य को विद्यालय से बाहर जाते देख छात्राएं उन्हें रोकने के लिए आगे बढ़ीं.

 

देखते ही देखते परिसर में अफरा-तफरी और भगदड़ जैसी स्थिति बन गई. इस दौरान कुछ छात्राओं को मामूली चोटें भी आईं. बाद में प्रभारी प्राचार्य के विद्यालय परिसर में लौटने पर स्थिति सामान्य हुई.

 

सात महीने से एलपीसी रोकने का आरोप

छात्राओं के इस भावनात्मक विरोध के बीच जिला शिक्षा पदाधिकारी मुकुल राज ने निलंबन के पीछे विभागीय कारण गिनाए हैं. उनका कहना है कि प्रभारी प्राचार्य पिछले सात महीने से विद्यालय के एक शिक्षक का लास्ट पेमेंट सर्टिफिकेट (एलपीसी) जारी नहीं कर रहे थे.

 

इस संबंध में उन्हें कई बार बुलाया गया, लेकिन वे कार्यालय नहीं पहुंचे. विभाग की ओर से तीन बार शो-कॉज किया गया. इसके बावजूद अपेक्षित जवाब नहीं मिलने पर विभागीय प्रक्रिया पूरी कर तीन नवंबर को उन्हें निलंबित कर दिया गया.

 

डीईओ के मुताबिक, विद्यालय के पूर्व के लेखा-जोखा का हिसाब भी मांगा गया था, जिसे उपलब्ध नहीं कराया गया. इसके अलावा प्रभारी प्राचार्य पर कोचिंग संचालन से जुड़े आरोप भी हैं. मुकुल राज ने बताया कि निलंबन के अगले दिन चार नवंबर को शशिभूषण कुमार अपना प्रभार सौंपने के लिए जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय पहुंचे थे.

 

बच्चे प्रशासन चलाना नहीं सिखाएंगेः जिला शिक्षा पदाधिकारी मुकुल राज

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि प्रभारी प्राचार्य के कामकाज में इतनी खामियां थीं, तो छात्राएं उनके समर्थन में इस कदर क्यों खड़ी हुईं? क्या विभाग ने कभी यह जानने की कोशिश की कि छात्राओं के बीच उनकी छवि कैसी थी? क्या बच्चों को लगता था कि उनके हितों के लिए प्रभारी प्राचार्य काम कर रहे थे? इन सवालों पर जिला शिक्षा पदाधिकारी से जब जवाब मांगा गया, तो उन्होंने कहा, 'बच्चे प्रशासन चलाना नहीं सिखाएंगे.' उनका कहना है कि विभाग ने नियमानुसार कार्रवाई की है और सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है.

 

शिक्षकों में भी विभाग के प्रति नाराजगी

मामला केवल छात्राओं के विरोध तक सीमित नहीं है. जिले के कुछ अन्य शिक्षकों ने भी नाम नहीं छापने की शर्त पर जिला शिक्षा कार्यालय की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि कार्यालय में शिक्षकों का भयादोहन किया जाता है.

 

जो शिक्षक बेहतर तरीके से काम करने का प्रयास करते हैं, उन्हें भी परेशान किया जाता है. शिक्षकों के अनुसार, इसी तरह के व्यवहार के कारण जिले में असंतोष की स्थिति बन रही है और ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं.

 

वहीं, निलंबित प्रभारी प्राचार्य शशिभूषण कुमार का कहना है कि उन्होंने विभागीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप बच्चों के हित में काम किया है. आगे भी विभाग की ओर से मिलने वाले निर्देशों का पालन करेंगे.

 

बच्चों की आवाज को भी सुनने की जरूरत

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात छात्राओं का विरोध है. प्रशासनिक फाइलों में किसी शिक्षक के खिलाफ शिकायतें और विभागीय कार्यवाही अपनी जगह हो सकती हैं, लेकिन जब विद्यार्थी अपने शिक्षक के समर्थन में सड़क पर उतरते हैं, तो उस आवाज को केवल अनुशासनहीनता या प्रशासनिक हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.

 

इसके पीछे बच्चों का अनुभव, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव भी हो सकता है. विभाग को चाहिए कि वह निलंबन के कारणों के साथ-साथ छात्राओं के विरोध की वजहों की भी निष्पक्ष जांच करे. 

 

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