आरोप है कि इन लोगों ने जिला खनन कार्यालय से जारी Contiguous Report में छेड़छाड़ और जालसाजी कर SEIAA से पर्यावरणीय स्वीकृति हासिल की और खनन पट्टे प्राप्त किए. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह जालसाजी वर्ष 2022-23 में हुई थी और जिला खनन कार्यालय को इसकी जानकारी जनवरी 2024 में ही मिल गई थी, तो फिर प्राथमिकी दर्ज कराने में दो साल से अधिक की देरी क्यों हुई?
ऑडिट में खुला खेल, तब हरकत में आया विभाग
महालेखाकार (AG) की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 5 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली खनन परियोजनाओं को फर्जी तरीके से 5 हेक्टेयर से कम दिखाकर B-1 श्रेणी की जगह B-2 श्रेणी की पर्यावरण मंजूरी हासिल की गई. इससे पर्यावरणीय जांच की कड़ी प्रक्रिया से बचते हुए खनन पट्टे प्राप्त कर लिए गए.
ऑडिट रिपोर्ट के बाद SEIAA ने संबंधित पर्यावरणीय स्वीकृतियां रद्द की और उपायुक्त ने मार्च 2025 में खनन पट्टे भी निरस्त कर दिए. इसके बावजूद एफआईआर दर्ज कराने की कार्रवाई जून 2026 में जाकर शुरू हुई.
हाईकोर्ट तक पहुंचा था मामला
इस कथित घोटाले को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता पंकज यादव ने जनहित याचिका दायर की थी. मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने ACB को जांच करने की अनुमति भी दी थी. इसके बावजूद लंबे समय तक न तो किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई हुई और न ही प्राथमिकी दर्ज हुई. अब सवाल उठ रहा है कि जब हाईकोर्ट के संज्ञान, ऑडिट रिपोर्ट और पर्यावरण मंजूरियों की वापसी जैसे तथ्य पहले से मौजूद थे, तो आखिर कार्रवाई रोकने वाला कौन था?
सिर्फ पट्टाधारियों पर कार्रवाई या अधिकारियों की भी होगी जवाबदेही?
एफआईआर के लिए भेजे गए पत्र में खनन पट्टाधारियों और आवेदकों के नाम हैं. लेकिन Contiguous Report जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ की प्रक्रिया के दौरान विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं.
क्या यह संभव है कि करोड़ों रुपये के खनन पट्टे जारी होते रहें और विभाग को इसकी भनक तक न लगे? यदि रिपोर्ट में छेड़छाड़ हुई तो उसकी जांच सिर्फ पट्टाधारियों तक सीमित रहेगी या उन अधिकारियों की भूमिका भी खंगाली जाएगी, जिनके कार्यकाल में यह पूरा खेल हुआ?
सरकार को सैकड़ों करोड़ के नुकसान का दावा
खनन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि पर्यावरणीय नियमों को दरकिनार कर वर्षों तक हुए खनन से सरकार को 200 से 500 करोड़ रुपये तक का राजस्व नुकसान हो सकता है. हालांकि नुकसान की वास्तविक राशि का निर्धारण विस्तृत जांच के बाद ही संभव होगा.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिला खनन कार्यालय को वर्ष 2024 में ही Contiguous Report में जालसाजी की जानकारी मिल गई थी, हाईकोर्ट तक मामला पहुंच चुका था, ACB को जांच की अनुमति भी मिल चुकी थी और पर्यावरणीय स्वीकृतियां व खनन पट्टे तक रद्द किए जा चुके थे, तो फिर प्राथमिकी दर्ज कराने में दो साल से अधिक की देरी क्यों हुई?
क्या इस दौरान किसी प्रभावशाली व्यक्ति या तंत्र के दबाव में कार्रवाई रोकी गई? साथ ही, क्या जांच केवल खनन पट्टाधारियों और आवेदकों तक सीमित रहेगी या उन विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच होगी, जिनके कार्यकाल में कथित जालसाजी के आधार पर पर्यावरणीय स्वीकृतियां और खनन पट्टे जारी हुए?
यदि यह मामला वास्तव में करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान और बड़े फर्जीवाड़े से जुड़ा है, तो अब तक किसी अधिकारी की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई और उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
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