- हाईकोर्ट के आदेश को दी थी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
- हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाए जाने के आदेश को लिया वापस
- प्रार्थी पर लगाया था 12 लाख का जुर्माना
- जिला प्रशासन ने खादगड़ा शिव दुर्गा मंदिर रोड स्थित मुंडारी प्रकृति की जमीन पर बने 12 घरों को तोड़ने की कार्रवाई की थी
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट के 31 जुलाई के आदेश के खिलाफ महादेव उरांव की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एसएलपी पर सुनवाई हुई. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महादेव उरांव को राहत नहीं देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी.
सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आपने पहले पीड़ितों से पैसा लेकर जमीन बेच दी. इसके बाद कब्जा दिलाने का आग्रह कोर्ट से किया. यह जालसाजी का मामला बन सकता है. अदालत ने कहा कि अगर वह इस केस को चलाना चाहते हैं तो उनपर जालसाजी करने को लेकर 10 लाख का जुर्माना भी लग सकता है.
इसके बाद प्रार्थी महादेव उरांव ने याचिका वापस लेने का आग्रह किया. उनके आग्रह को देखते हुए कोर्ट ने उनकी एसएलपी खारिज कर दी.
बता दें कि 31 जुलाई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने महादेव उरांव की अवमानना याचिका पर फैसला सुनाया था. मामले में कोर्ट ने रिट याचिका में प्रार्थी के पक्ष में सुनाए गए एकल पीठ के आदेश को वापस ले लिया था, जिसमें उसने सीओ को अतिक्रमण हटाने से संबंधित कार्रवाई का आदेश दिया था.
हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रार्थी ने रिट याचिका में प्रतिवादियों की ओर से दिए गए एक करोड रुपए की राशि के बारे में बात छुपाई थी. साथ ही उन्हें रिट याचिका में प्रतिवादी भी नहीं बनाया था. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राजेश शंकर की कोर्ट ने महादेव उरांव पर 12 लाख का जुर्माना लगाया था.
वहीं महादेव उरांव को 12 प्रतिवादी (पीड़ितों) को 1-1 लाख रुपए देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा था कि प्रार्थी ने शपथ पत्र में झूठा तथ्य दिया है और कोर्ट को गुमराह किया है. हस्तक्षेपकर्ताओं से पैसे की लेनदेन की बात छुपाई थी.
दरअसल जिला प्रशासन ने खादगड़ा शिव-दुर्गा मंदिर रोड स्थित मुंडारी प्रकृति की जमीन पर बने 12 घरों को तोड़ने का आदेश दिया था. इसके तहत बुलडोजर की कार्रवाई शुरू की गई थी, जिसका स्थानीय निवासी विरोध कर रहे थे.
स्थानीय लोगों का कहना था कि उन्होंने प्रति कट्ठा 5.25 लाख रुपये के हिसाब से भुगतान कर जमीन खरीदी है और यहां वर्षों से घर बनाकर रह रहे हैं. लोगों का आरोप है कि 38.25 डिसमिल जमीन के लिए उन्होंने 1 करोड़ 8 लाख 93 हजार 750 रुपये का भुगतान किया था, लेकिन अब उन्हें बेदखल किया जा रहा है.
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