Ranchi News : रांची विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर वोकेशनल स्टडीज (सीवीएस) में संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया में कथित अनियमितता और नियमों की अनदेखी का मामला सामने आया है.
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विश्वविद्यालय के पूर्व सीनेट सह सिंडिकेट सदस्य डॉ. अटल पांडेय ने राज्यपाल को पत्र लिखकर नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है. उन्होंने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, मेधा सूची में विसंगतियों और आरक्षण रोस्टर के पालन पर सवाल उठाए हैं.
छह पदों पर हुई नियुक्ति
रांची विश्वविद्यालय ने 23 अप्रैल 2026 को विज्ञापन जारी कर एमबीए और बीबीए के छह सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे थे. इनमें एमबीए-एचआर के दो, एमबीए-फाइनेंस के दो, एमबीए-आईटी का एक और बीबीए-फाइनेंस का एक पद शामिल था.
इन पदों के लिए 27 जुलाई 2026 को साक्षात्कार हुआ. इसके बाद सितंबर के अंतिम सप्ताह में चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई. विज्ञापन में साफ कहा गया था कि नियुक्ति सरकार के तय नियमों और आरक्षण व्यवस्था के अनुसार होगी.
अच्छे अंक पाने वाले अभ्यर्थियों के चयन ना होने पर सवाल
डॉ. पांडेय का आरोप है कि मेधा सूची में अच्छे अंक पाने वाले कई अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं मिली, जबकि सूची में उनसे नीचे रहने वाले अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया. उन्होंने दावा किया कि 72 अंक पाने वाले अभ्यर्थियों का भी चयन नहीं हुआ, जबकि पांचवें, सातवें, 10वें, 17वें, 28वें और 40वें स्थान पर रहने वाले अभ्यर्थियों को चुन लिया गया. उन्होंने सवाल उठाया है कि जब चयन के लिए अंक और योग्यता तय थी, तो उसके अनुसार नियुक्ति क्यों नहीं हुई.
संशोधित सूची जारी किए बिना घोषित किया परिणाम
शिकायत के अनुसार, विश्वविद्यालय की ओर से जारी मेधा सूची को अस्थायी बताया गया था. विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और सीवीएस निदेशक का कहना है कि साक्षात्कार के दिन दस्तावेजों की जांच के दौरान कुछ अभ्यर्थियों के अंक बदले गए थे.
डॉ. पांडेय का कहना है कि अगर जांच के बाद अंक बदले गए थे, तो नई सूची भी सार्वजनिक करनी चाहिए थी. उनका आरोप है कि संशोधित सूची जारी किए बिना सीधे अंतिम परिणाम घोषित करने से पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं.
साक्षात्कार में बुलाने के नियम पर भी आपत्ति
डॉ. पांडेय ने झारखंड सरकार के वर्ष 2018 के नियमों का हवाला देते हुए कहा है कि हर पद के लिए तीन गुना अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना चाहिए था. उन्होंने आशंका जताई है कि इस नियम का सही तरीके से पालन नहीं किया गया. उन्होंने मांग की है कि यह जांच की जाए कि साक्षात्कार के लिए किन अभ्यर्थियों को बुलाया गया था और क्या सभी नियमों का पालन हुआ था.
आरक्षण व्यवस्था पर भी उठाए सवाल
शिकायत में कहा गया है कि छह चयनित अभ्यर्थियों में पांच सामान्य वर्ग और एक अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग से हैं. अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से किसी अभ्यर्थी का चयन नहीं होने पर भी सवाल उठाए गए हैं.
डॉ. पांडेय ने मांग की है कि विश्वविद्यालय आरक्षण से जुड़ी सूची और रोस्टर रजिस्टर सार्वजनिक करे. इससे पता चल सकेगा कि किस वर्ग के लिए कितने पद निर्धारित थे और नियुक्ति में आरक्षण के नियमों का पालन हुआ या नहीं. उन्होंने यह भी कहा कि चयनित अभ्यर्थियों को किस विषय और किस श्रेणी के पद पर चुना गया है, इसकी जानकारी भी साफ-साफ दी जानी चाहिए.
राज्यपाल से क्या मांग की गई?
डॉ. पांडेय ने राज्यपाल से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि विश्वविद्यालय को अभ्यर्थियों की मूल और संशोधित मेधा सूची, उनके शैक्षणिक अंक, साक्षात्कार में मिले अंक, चयन समिति की बैठक का विवरण और आरक्षण से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए.
उन्होंने यह भी मांग की है कि यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है, तो चयन सूची रद्द कर पारदर्शी तरीके से दोबारा साक्षात्कार कराया जाए. इसके अलावा, विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (आईएलएस) में हुई नियुक्तियों की भी जांच कराने की मांग की गई है. फिलहाल, नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी के ये आरोप शिकायतकर्ता ने लगाए हैं. इनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी.
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