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सुधीर पाल की नई पुस्तकों का विमोचन, आदिवासियों का संवैधानिक कवच है पांचवीं अनुसूची- महुआ माजी

Ranchi News : लोकार्पित हुई पुस्तकों में 'झारखंड में पेसा' पर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला और रामचंद्र उरांव ने अपने विचार रखे. उन्होंने इसे ग्राम सभा की सर्वोच्चता और सामुदायिक स्वशासन का सशक्त माध्यम बताया. वहीं, 'पांचवीं अनुसूची' पुस्तक पर वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन और साहित्यकार रणेंद्र ने चर्चा की.
 
पुस्तक का लोकार्पण
  • लेखक सुधीर पाल की किताबों का हुआ लोकार्पण

Ranchi News : पांचवीं अनुसूची आदिवासियों और मूलवासियों की संवैधानिक रक्षा का कवच है. इसे केवल कानून के दायरे में न देखकर, इतिहास और सामाजिक न्याय के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. यह बातें राज्यसभा सांसद महुआ माजी ने कहीं.

 

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वह शनिवार को लेखक सुधीर पाल की नई पुस्तकों के लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रही थीं. इस कार्यक्रम का आयोजन जनवादी लेखक संघ द्वारा रांची प्रेस क्लब में किया गया था.

 

विभिन्न पुस्तकों पर वक्ताओं ने रखी अपनी बात

लोकार्पित हुई पुस्तकों में 'झारखंड में पेसा' पर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला और रामचंद्र उरांव ने अपने विचार रखे. उन्होंने इसे ग्राम सभा की सर्वोच्चता और सामुदायिक स्वशासन का सशक्त माध्यम बताया. वहीं, 'पांचवीं अनुसूची' पुस्तक पर वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन और साहित्यकार रणेंद्र ने चर्चा की.

 

उन्होंने कहा कि यह किताब राजनीति और कॉर्पोरेट गठजोड़ की जमीनी हकीकत को सामने लाती है. तीसरी पुस्तक 'आंतरिक उपनिवेश और आदिवासी प्रश्न' पर साहित्यकार महादेव टोप्पो और शिक्षाविद डॉ. मिथिलेश ने अपनी बात रखी. टोप्पो ने शासन का कामकाज क्षेत्रीय भाषाओं में करने की मांग की.

 

इतिहास को समझने में मददगार हैं ये किताबें

इतिहासकार डॉ. एलएन राणा ने इन पुस्तकों को झारखंड के इतिहास और औपनिवेशिक राजनीति को समझने में बेहद मददगार बताया. डॉ. जेपी गुप्ता ने कहा कि ये किताबें सात दशक पुरानी जानकारी की कमी को पूरा करती हैं. कार्यक्रम के अंत में डॉ. अशरफ अली, प्रियंका उरांव, यासमीन लाल, सत्यनारायण मुंडा सहित अन्य जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के कवियों ने जन सरोकार से जुड़ी कविताओं का पाठ किया.

 

इस मौके पर इतिहास के सेवानिवृत प्राध्यापक और लेखक डॉ एल एन राणा ने कहा कि ये किताबें झारखंड के इतिहास, समाज, समुदाय और उनके संघर्षों को बेहतर ढंग से समझने में मददगार है. इन किताबों को पढ़ते हुए आप औपनिवेशिक राजनीति को बेहतर समझ पाएंगे. किताब में सुधीर पाल ने मनोयोग से बताया है कि समय, राजनीति और आर्थिक स्वार्थ की गठबंधन ने इस क्षेत्र को अपने क़ैदखाने में तब्दील कर दिया है. 

 

वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि कुमार बृजेन्द्र ने सत्र की अध्यक्षता करते हुए इन किताबों को आज के समय की जरूरत बताई. संचालन श्रीमती अपराजिता ने किया.

 

‘झारखंड में पेसा: परंपरा, पंचायत और जवाबदेही’ पुस्तक पर चर्चा करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखिका दयामनी बारला ने कहा कि राज्य में पेसा लागू होने के बाद संसाधनों पर मालिकाना और प्रबंधन की लड़ाई को बल मिला है. यह किताब ग्राम सभा की सर्वोच्चता को आदिवासी इलाकों में सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में स्थापित करता है. 

 

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के व्याख्याता रामचन्द्र उरांव ने कहा कि किताब में बार-बार यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा बनाम आधुनिकता का नहीं है, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता बनाम सामुदायिक स्वशासन का है. यह टकराव उस विकास मॉडल का है, जो स्थानीय समाज को साझेदार नहीं, बाधा मानता है. सत्र की अध्यक्षता करते हुए लेखिका डॉ किरण ने कहा कि पेसा को जानने और समझने का यह एक प्रामाणिक दस्तावेज है. संचालन श्रीमती आलम आरा ने किया.   

 

‘पांचवीं अनुसूची: परंपराओं  का गणराज्य’ पर चर्चा में भाग लेते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रश्मि कात्यायन सुधीर पाल की किताब पाँचवीं अनुसूचित क्षेत्र को केवल कानून के दायरे में न देखकर, उसे इतिहास, सामाजिक न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बहुआयामी त्रिकोण से देखने का नजरिया विकसित करती है. 

 

साहित्यकार रणेंद्र ने कहा कि यह किताब किस्से-कहानियों के माध्यम से उन जमीनी हकीकतों से रू-ब-रू कराता है जहां संविधान और कानून को राजनीति और कॉर्पोरेट की गठजोड़ से केवल दिखावे का जरिया बना दिया गया है.

 

डॉ जे पी गुप्ता ने कहा कि बिडम्बना है कि आम आदमी के लिए सात दशक के बाद भी पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र को समग्रता में जानने -समझने के लिए कोई किताब उपलब्ध नहीं थी, यह किताब उस कमी को पीरा करती है. इस सत्र का संचालन श्री अशरफ ने किया.

 

‘आंतरिक उपनिवेश और आदिवासी प्रश्न’ किताब पर चर्चा करते हुए साहित्यकार महादेव टोप्पो ने कहा कि संकलित लेखों में बार-बार यह स्पष्ट होता है कि टकराव परंपरा बनाम आधुनिकता का नहीं है, बल्कि केंद्रीकृत सत्ता बनाम सामुदायिक स्वशासन का है. यह टकराव उस विकास मॉडल का है, जो स्थानीय समाज को साझेदार नहीं, बाधा मानता है. उन्होंने शासन की भाषा क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा में किए जाने की वकालत की. 

 

शिक्षविद और लेखक डॉ मिथिलेश ने कहा कि आंतरिक उपनिवेशवाद उस व्यवस्था की कहानी है, जिसमें राष्ट्र-राज्य अपने ही नागरिकों के एक बड़े हिस्से के साथ उपनिवेश जैसा व्यवहार करता है. उपनिवेशवाद से पहले दानवीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी. अध्यक्षता करते हुए डॉ विनोद कुमार ने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता को हटाने की जरूरत है. इस सत्र का संचालन श्रीमती यासमीन लाल ने किया.

 

इस अवसर पर आयोजित कवि गोष्ठी में आधे दर्जन से ज्यादा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के कवियों ने जन सरोकार से जुड़े विषयओं पर रचनाएं सुनाई. डॉ अशरफ अली, प्रियंका उरांव, यासमीन लाल, सत्यनारायण मुंडा, सालों उरांव, दिव्या मुर्मू, रीता सोरेनग, महावीर उरांव,मनीषा बोदरा तथा शिवशंकर उरांव ने कविताएं पढ़ी. इस सत्र का संचालन विकी मिनज़ और सुकेशी कर्मकार ने किया. कार्यक्रम को सफल बनाने में जनवादी लेखक संघ के एम जेड खान, आलम आरा, यासमीन लाल, सुकेशी कर्मकार, विकी मिनज़, आदि की भूमिका रही.

 

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