Ranchi: झारखंड राज्य लोक सेवा आयोग (JPSC) नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच में शुरू से ही रोड़े अटकाती रही है. इसकी वजह से सीबीआई का ज्यादातर समय जांच के बदले कानूनी लड़ाई में गुजर गया और आरोप पत्र दायर करने में 12 साल लगे.
जेपीएससी नियुक्ति घोटाले में सीबीआई जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी. नियुक्ति घोटाले में निगरानी जांच पर असंतोष जताते हुए सीबीआई जांच की मांग के लिए जनहित याचिका दायर की गयी थी. सरकार सहित आयोग ने भी इस याचिका का विरोध किया था. कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद सरकार और जेपीएससी के दावों और दलील को खारिज कर दिया. साथ ही कोर्ट ने सीबीआई को नियुक्ति घोटाले की जांच का आदेश दिया.
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कोर्ट के आदेश के आलोक में सीबीआई ने PE दर्ज की. प्रारंभिक जांच के बाद नियमित प्राथमिकी दर्ज की. प्राथमिकी दर्ज होने के बाद सीबीआई ने सबसे पहले ट्रायल कोर्ट में एक पिटिशन दायर किया. इसमें न्यायालय से अनुरोध किया गया था, वह आयोग द्वारा ली गयी परीक्षाओं से संबंधित कॉपियों का नये सिरे मूल्यांकन कराने का आदेश दे. इसके लिए सीबीआई की ओर से यह तर्क पेश किया गया था कि नियुक्ति घोटाले की निष्पक्ष जांच के लिए ऐसा करना जरूरी है. क्योंकि कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कराने की स्थिति में नियुक्ति घोटाले से लाभान्वित हुए छात्र बच जायेंगे.
जेपीएससी में हुए नियुक्ति घोटाले में सिर्फ आयोग के पदाधिकारियों की ही संलिप्तता नहीं है. इसमें लाभांवित परीक्षार्थी के अलावा परीक्षा की प्रक्रिया में शामिल दूसरे लोग भी संलिप्त हैं. कॉपियों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कराये जाने पर लाभांवित होने वाले परीक्षार्थियों के पास यह कहने का कानूनी आधार होगा कि उन्होंने परीक्षा के बाद अपनी कॉपियां जमा करा दी थी. इसमें किसी तरह की गड़बड़ी के लिए आयोग जिम्मेवार है. किसी भी तरह की गड़बड़ी के लिए परीक्षार्थी जिम्मेवार नहीं हैं.
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ट्रायल कोर्ट ने सीबीआई की दलील को स्वीकार करते हुए कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन का आदेश दिया. इसके बाद से ही सीबीआई के साथ जेपीएससी और परीक्षार्थियों की कानूनी लड़ाई शुरू हुई. सबसे पहले ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी. इसमें यह दलील दी गयी कि ट्रायल कोर्ट को इस बात का कानूनी अधिकार नहीं है कि वह जांच एजेंसी को जांच करने के तरीकों से संबंधित आदेश दे. यानी ट्रायल कोर्ट सीबीआई को कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन का आदेश नहीं दे सकता है.
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद इस दलील को स्वीकार कर लिया कि ट्रायल को जांच के तरीकों से संबंधित आदेश निर्देश देने का अधिकार नहीं है. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सीबीआई चाहे तो वह अपने स्तर से जांच करा सकती है.
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन की सीबीआई की योजना काफी दिनों तक ठप्प रही. इसके बाद सीबीआई ने कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए जेपीएससी से यह अनुरोध किया कि वह कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था करे.
सीबीआई के इस पत्र को झारखंड लोक सेवा आयोग ने कोर्ट में चुनौती दी. इसमें जेपीएससी की ओर से यह तर्क पेश किया गया कि जेपीएससी के लिए बनाये गये नियम में कॉपियों के पुनर्मुल्यांकन का कोई प्रावधान ही नहीं है. इस नियम के आलोक में सीबीआई का पत्र कानून सम्मत नहीं है. जेपीएससी और सीबीआई के बीच छिड़ी इस कानूनी जंग पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन कराये जाने पर सहमति दी. साथ ही इसमें आयोग को सीबीआई की मदद करने का निर्देश दिया.
कोर्ट के इस निर्देश के आलोक में सीबीआई ने आयोग को पत्र लिख कर कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन के लिए संबंधित विषयों के विशेषज्ञों की टीम बनाने का निर्देश दिया. सीबीआई के निर्देश के आलोक में जेपीएससी ने विशेषज्ञों की टीम बनाने की आनाकानी की. काफी मशक्कत के बाद आयोग ने विशेषज्ञों की टीम बनायी. लेकिन विशेषज्ञ पुनर्मूल्यांकन के काम में शामिल होने से इनकार करने लगे. इस स्थिति से निपटने के लिए सीबीआई द्वारा विशेषज्ञों टीम के खिलाफ कार्रवाई करने की चेतावनी दी गयी. इसके बाद कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन का काम शुरू हुआ. इसमें इस बात का आकलन किया गया कि किसी परीक्षार्थी द्वारा लिखे गये उत्तर पर उसके अधिकतम कितना नंबर दिया जा सकता था. इसके बदले उसके कितना नंबर अधिक दिया गया.
कॉपियों के पुनर्मूल्यांकन का काम अभी चल ही रहा था कि परीक्षार्थियों के एक समूह ने राज्य सरकार द्वारा उनसे काम नहीं लेने और वेतन बंद करने के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान काम लेने और वेतन देने का आदेश दिया. इसके साथ ही इस आदेश में यह भी लिख दिया कि सुप्रीम कोर्ट मामले में सीबीआई जांच जारी रखने के पक्ष में नहीं है. फैसले में शामिल शब्द “नहीं” को लेकर काफी दिनों तक अलग-अलग तरह की चर्चा चलती रही. दूसरी तरफ वर्षों जेपीएससी नियुक्ति घोटाले की सीबीआई जांच बंद रही.
निधि खरे के कार्मिक सचिव के रूप में कार्य करने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश में संशोधन हुआ और फैसले से "नहीं" शब्द को हटाया गया. इससे फैसले का अर्थ बदल कर यह हो गया कि कोर्ट मामले में सीबीआई जांच जारी रखने के पक्ष में है.
तत्कालीन कार्मिक सचिव को इसके लिए काफी मेहनत करनी पड़ी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसले में संशोधन करते हुए नहीं शब्द हटाने के बाद सीबीआई ने करीब तीन साल बाद जांच फिर से शुरु की. बाकी बचे काम को पूरा किया और प्राथमिकी दर्ज करने के 12 साल बाद आरोप पत्र दायर किया.




