Ranchi: झारखंड में होने वाली नियुक्तियों में भ्रष्टाचार की जांच कोई भी एजेंसी करे. योगदान करने के बाद नौकरी किसी की नहीं जाती है. सिर्फ इतना ही नहीं आरोप पत्र दायर होने के बाद न्यायालय के आदेश के बाद प्रोन्नति भी मिल जाती है. जांच और कानूनी दांवपेंच में उलझी यह एक ऐसी स्थिति है जो छात्रों में निराशा का कारण बनता है.
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हाईकोर्ट के आदेश के आलोक में सीबीआई ने झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अयोग्य लोगों के चयन से जुड़े तीन महत्वपूर्ण मामलों की जांच की. आरोप पत्र दायर किया. सभी आरोपियों को जमानत मिली. सभी नौकरी कर रहे हैं और प्रमोशन भी पा रहे हैं. कोई अफसर बनकर जनता की किस्मत का फैसला कर रहा है तो काई शिक्षक बनकर पढ़ा रहा है. यानी देश का भविष्य गढ़ रहा है. इसपर सभी पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें और कोर्ट के अलग-अलग आदेशों के उदाहरण भी हैं. आयोग की परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी से लाभान्वित लोग कोर्ट से जब तक दोषी करार नहीं दिये जाते, तब तक उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती है. पर यह कब होगा? कोई नहीं बता सकता.
लेक्चरर नियुक्ति में घपला
लेक्चरर परीक्षा में हुई गड़बड़ी की जांच भी हाईकोर्ट के आदेश के आलोक में शुरू हुई थी. इसमें भी आयोग के अध्यक्ष दिलीप प्रसाद और सदस्य शांति देवी द्वारा जालसाजी कर अपने रिश्तेदारों को लेक्चरर बनाये जाने की पुष्टि हुई. हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने इस मामले में वर्ष 2013 में प्राथमिकी दर्ज की. हालांकि वह छह साल बाद ही इस मामले में आरोप पत्र दायर कर पायी. सीबीआई द्वारा दर्ज प्राथमिकी में तीन लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया था. इसमें JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप प्रसाद, परीक्षा नियंत्रक एलिस उषा रानी सिंह और परीक्षा का काम करने वाली ग्लोबल इनफॉरमेटिक्स नामक एजेंसी.
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नियुक्तियों में गड़बड़ी के आरोप में जांच एजेंसियों ने जितनी भी प्राथमिकी दर्ज की है, सबमें परीक्षा का काम करने वाली एजेंसी को अभियुक्त बनाया गया और आरोप पत्र भी दायर किया गया है. यानी नियुक्तियों के घोटाले में अधिकारियों के अलावा परीक्षा का काम करने वाली एजेंसी की भी भूमिका पहले भी महत्वपूर्ण थी और आज भी है.
लेक्चरर परीक्षा की जांच के लिए दर्ज प्राथमिकी में यह आरोप लगाया गया था कि JET 2006 के रिजल्ट और इंटरव्यू में गड़बड़ी कर आयोग्य लोगों को भी लेक्चरर के पद पर नियुक्त किया गया है. सीबीआई ने जांच के बाद कुल 69 अभियुक्तों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया. इसमें आयोग के सदस्यों, पदाधिकारियों, परीक्षा काम करने वाली एजेंसी के अलावा लेक्चरर के पद पर नियुक्त किये गये लोगों का नाम शामिल है.
आयोग द्वारा राज्य के तीन विश्वविद्यालयों में लेक्चरर के 722 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू की गयी थी. नियुक्ति के लिए Ph.D/M.Phil/JET/NET/SLET के रिजल्ट और इंटरव्यू को आधार बनाया गया था. जांच में पाया गया कि JET का रिजल्ट तैयार करने में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गयी थी. इसके उद्देश्य लेक्चरर की नियुक्ति में आवेदन देने के योग्य बनाना था. JET परीक्षा में JPSC के नियमों का उल्लंघन किया गया था.
नियमानुसार कॉपियों को मूल्यांकन के लिए भेजने से पहले कोडिंग करने की बाध्यता है. लेकिन मूल्यांकन के लिए भेजे जाने से पहले कॉपियों की कोडिंग नहीं की गयी थी. रिजल्ट जारी करने के लिए मेरिट लिस्ट बनाना जरूरी है. सीबीआई ने जांच के दौरान रिजल्ट से जुड़े दस्तावेज में मेरिट लिस्ट नहीं पाया. JET के रिजल्ट में मनमानी कर खास लोगों को लेक्चरर के रूप में नियुक्त करने के योग्य बनाया गया.
जांच के दौरान पाया गया कि कुछ छात्रों के पेपर-3 का मूल्यांकन गलत तरीके से किया गया था. नियमानुसार पेपर-1 और पेपर-2 में क्वालिफाइंग मार्क्स लाने वालों के ही पेपर-3 का मूल्यांकन किया जाना था. लेकिन पेपर-1 और पेपर-2 में क्वालिफाइंग मार्क्स नहीं लाने वाले परीक्षार्थियों के पेपर-3 का मूल्यांकन कर उन्हें गलत तरीके से लाभ पहुंचाया गया. आयोग के पास पेपर-1 और पेपर-2 का OMR Sheet भी नहीं था. कॉपियों का मूल्यांकन करने वालों को विधिवत पत्र भी नहीं दिया गया था.
सीबीआई जांच शुरू होने के बाद आयोग ने JET का मेरिट लिस्ट बनाया. आयोग द्वारा तैयार किये गये इस मेरिट लिस्ट की जांच में यह पाया गया कि 676 सफल परीक्षार्थियों में से 191 का परीक्षार्थियों का नंबर कम होने के बावजूद उन्हें परीक्षा में सफल घोषित कर दिया गया था.
जालसाजी कर सफल घोषित किये गये 191 में से 37 को आयोग द्वारा लेक्चरर के पद पर नियुक्त कर लिया गया. जालसाजी के JET पास कर लेक्चरर बनने वालों में आयोग के अध्यक्ष गोपाल प्रसाद के भाई विवेकानंद सिंह, सदस्य शांति देवी की बहन कांति कुमारी का नाम शामिल है.




