Ranchi : शेर सहित दूसरे जानवरों का खाना मांगने सरकार हाईकोर्ट पहुंची है. वन विभाग ने हाईकोर्ट में हस्तक्षेप याचिका दायर कर कोर्ट से उस आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया है, जिसमें कोर्ट ने आनंद कुमार बनाम राज्य सरकार के मामले में वन विभाग और उससे संबंधित प्राधिकार से पैसा निकालने पर पाबंदी लगा दी थी. इस आदेश की वजह से बिरसा मुंडा चिड़ियाघर के शेर सहित अन्य जानवरों के खाने पीने पर आफत आ गयी है.
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कोर्ट के इस आदेश के बाद बिरसा मुंडा चिड़िया घर के शेर, भानू, सहित अन्य सभी जंगली जानवरों के लिए खाने और सफाई आदि की व्यवस्था में बहुत परेशानी पैदा हो गयी थी. कोर्ट ने रेंजर आनंद कुमार का बकाया भुगतान होने तक पैसों की निकासी (योजना और गैर योजना) पर पाबंदी लगा दी थी.
सरकार की ओर मामले में दायर हस्तक्षेप याचिका में यह भी कहा गया है कि रेंजर आनंद कुमार का कोई बकाया नहीं है. उन्हें जनवरी 2022 में 6.70 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है. याचिकादाता का कोई बकाया नहीं है. याचिकादाता को दंडित किया गया था इसमें निंदन की सजा के साथ ही तीन वेतन वृद्धि पर रोक शामिल था.
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दंड के लिए 7 जनवरी 2005 को अधिसूचना जारी की गयी थी. दस्तावेज़ की समीक्षा के दौरान पाया गया कि वेतन निर्धारण और वेतन पर्ची जारी करने के लिए अधिकृत वित्त विभाग को इस दंड की जानकारी नहीं थी. इसलिए याचिकादाता के वेतन वृद्धि पर रोक नहीं लगी. इसलिए याचिकादाता को नियमित वेतन मिलता रहा. उसे कोई वित्तीय नुकसान नहीं उठाना पड़ा. लेकिन याचिकादाता ने कोर्ट में इस तथ्य को छिपाया.
याचिका में कहा गया है कि गैर योजना मद से बहुत सारे महत्वपूर्ण काम किये जाते हैं. योजना के अधीन कार्यरत छोटे कर्मचारियों के जैसे फॉरेस्ट गार्ड आदि का वेतन का भुगतान भी योजना मद से किया जाता है. प्लांटेशन के काम में लगे मजदूरों की मजदूरी का भुगतान भी योजना मद से किया जाता है. लगाये जा चुके पौधों की देख भाल पर योजना मद से ही पैसा खर्च किया जाता है.
Park, Zoo, Sancturies के वन्य प्राणियों के लिए खाना-पीना, इलाज आदि की व्यवस्था भी योजना और गैर योजना मद से की जाती है. न्यायाल द्वारा 10 जून 2026 को दिये गये आदेश की वजह से इन वन्य प्राणियों के लिए परेशानी पैदा हो गयी है.
पैसों की निकासी नहीं हो पा रही है. इसलिए कोर्ट पैसों की निकासी पर लगी रोक से संबंधित आदेश को वापस ले. याचिकादाता का कोई पैसा बकाया नहीं है. उनके बकाये का भुगतान जनवरी 2022 में किया जा चुका है. याचिकादाता ने न्यायालय के सामने तथ्यों को छुपाया है.





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