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विभागीय जांच में सबूत नहीं तो दंड नहीं, सेवानिवृत्त इंजीनियर को हाईकोर्ट से राहत

Ranchi Court News : झारखंड हाईकोर्ट ने फर्जी बिटुमिन (अलकतरा) चालान से जुड़े मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद को राहत दी है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रौशन की कोर्ट ने एक ही मुद्दे से संबंधित सुरेंद्र प्रसाद की दो याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया.
 
झारखंड हाईकोर्ट
  • वेतन कटौती और सरकारी राशि की वसूली का दंड रद्द
  • फर्जी बिटुमिन (अलकतरा) चालान से जुड़ा मामला

Ranchi Court News : झारखंड हाईकोर्ट ने फर्जी बिटुमिन (अलकतरा) चालान से जुड़े मामले में सेवानिवृत्त सहायक अभियंता सुरेंद्र प्रसाद को राहत दी है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक रौशन की कोर्ट ने एक ही मुद्दे से संबंधित सुरेंद्र प्रसाद की दो याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाया. 

 

कोर्ट ने विभागीय जांच में दी गई वेतन कटौती और सरकारी राशि की वसूली की दंड को रद्द कर दिया. साथ ही विभागीय जांच रिपोर्ट और पुनर्विचार से संबंधित Letter No. 26(S) दिनांक 03.01.2025 को भी निरस्त कर दिया.

 

कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच में केवल सीबीआई की चार्जशीट या जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों को सबूत नहीं माना जा सकता. दस्तावेजों की सामग्री को सक्षम गवाह के माध्यम से साबित करना जरूरी है, ताकि संबंधित कर्मचारी को जिरह का प्रभावी अवसर मिल सके.

 

कोर्ट ने सुरेंद्र प्रसाद को उन सभी परिणामी लाभों का हकदार माना, जो उक्त दंड आदेश के कारण उन्हें नहीं मिल सके थे. कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे रिकॉर्ड की जांच कर परिणामी लाभों की गणना करें और आवश्यक आदेश जारी करते हुए इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 12 सप्ताह के भीतर उन्हें लाभ प्रदान करें.

 

हाईकोर्ट ने वेतन और पेंशन संबंधी लाभों से कथित सरकारी नुकसान की आनुपातिक वसूली को भी अस्थिर माना. अदालत ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि कितनी मात्रा में बिटुमिन का कथित कम उपयोग हुआ, उसका मूल्य कितना था, ठेकेदार से कितनी राशि वसूल की जानी थी और सुरेंद्र प्रसाद की व्यक्तिगत जिम्मेदारी के कारण सरकारी खजाने को कितना नुकसान हुआ. अदालत ने कहा कि बिना प्रमाण और स्पष्ट गणना के वेतन या पेंशन संबंधी लाभों से वसूली नहीं की जा सकती.

 

दरअसल, दो अलग-अलग मामलों में विभाग ने वर्ष 2015 में सुरेंद्र प्रसाद के वेतन को उनके पद के न्यूनतम वेतनमान तक घटाने और कथित सरकारी नुकसान की आनुपातिक राशि वसूलने का आदेश दिया था. कोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में कथित फर्जी चालानों, सीबीआई के दस्तावेजों, बिटुमिन की कथित कमी, सुरेंद्र प्रसाद की जिम्मेदारी और सरकारी नुकसान को साबित करने के लिए कोई विभागीय गवाह पेश नहीं किया गया.

 

उल्लेखनीय है कि सुरेंद्र प्रसाद ग्रामीण अभियंत्रण संगठन (वर्तमान में ग्रामीण कार्य विभाग) में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे और वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए. मामला वर्ष 2004-05 में बानो पीडब्ल्यूडी रोड से पबुरा-निमतुर-पनगुर पथ के निर्माण एवं मरम्मत कार्य से जुड़ा था. अदालत के आदेश के अनुसार, सीबीआई ने इस मामले में जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की थी. इसके आधार पर विभागीय कार्यवाही भी शुरू की गयी.

 

विभाग ने आरोप लगाया था कि ठेकेदार द्वारा बिटुमिन की खरीद से संबंधित कथित फर्जी चालानों पर सहायक अभियंता ने काउंटर साइन किया था, जिससे ठेकेदार को अनुचित भुगतान का लाभ मिला और सरकारी खजाने को नुकसान हुआ. सुरेंद्र प्रसाद को आपराधिक मामले में वर्ष 2019 में दोषी ठहराया गया था. हालांकि इसके खिलाफ उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने 15 मई 2024 को उन्हें बरी कर दिया था.

 

 

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