
देव कुमार धान
पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 को PESA अधिनियम 1996 के उद्देश्य आदिवासी स्वशासन, ग्राम सभा की सर्वोच्चता और पारंपरिक व्यवस्थाओं की रक्षा को सशक्त करने के लिए लाया गया था. लेकिन नियमावली के कुछ प्रावधान इसके ठीक उलट प्रभाव डालते दिखाई दे रहे हैं. खासकर नियम 22 और नियम 2 (छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और 2 ने आदिवासी समाज, ग्राम व्यवस्था और सामुदायिक संसाधनों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
संसाधनों का अधिकार, लेकिन सीमा अस्पष्ट
नियम 22 के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में स्थित सामुदायिक और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन का अधिकार दिया गया है. साथ ही “पारंपरिक सीमा” के भीतर संसाधनों के पंजीकरण और सभी ग्रामीणों को समान पहुंच की बात कही गई है. लेकिन मूल प्रश्न यह है कि यह पारंपरिक सीमा तय कौन करेगा? और किस संसाधन पर किस ग्राम सभा का अधिकार होगा? इस अस्पष्टता ने नियमावली की मंशा पर ही सवालिया निशान लगा दिया है.
टोला ग्राम सभा : सशक्तिकरण या विभाजन?
नियम 2 (छ), 3, 4, 5 और प्रपत्र 1–2 के तहत हर टोले को अलग ग्राम सभा और अलग गांव के रूप में मान्यता पाने का अवसर दिया गया है. यह प्रावधान पहली नजर में लोकतांत्रिक और सशक्तिकरण वाला लगता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम चिंताजनक हैं. जिन टोलों के भौगोलिक क्षेत्र में जंगल, जलस्रोत या अन्य प्राकृतिक संसाधन स्थित हैं, वे स्वयं को अलग ग्राम सभा घोषित कर सकते हैं और उन संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं.
साझा परंपरा पर एकाधिकार का खतरा
झारखंड के आदिवासी गांवों में संसाधनों का उपयोग और प्रबंधन सदियों से सामूहिक रहा है. राजस्व गांव की ग्राम सभा सभी टोलों के हित में निर्णय लेती रही है. नई नियमावली के तहत अलग बनी टोला ग्राम सभाएं इन साझा संसाधनों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेकर अन्य टोलों के निवासियों को उनसे वंचित कर सकती है. यह स्थिति सामाजिक न्याय के बजाय संसाधनों पर नए प्रकार के एकाधिकार को जन्म दे सकती है.
PESA की आत्मा से टकराव
PESA अधिनियम 1996 का मूल उद्देश्य आदिवासी समाज की परंपराओं की रक्षा, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और ग्राम सभा को वास्तविक शक्ति देना था. लेकिन PESA नियमावली 2025 के मौजूदा प्रावधान गांव-गांव में प्रतिस्पर्धा, टकराव और विभाजन की जमीन तैयार करते दिखाई देते हैं. यह न केवल सामाजिक एकता को कमजोर करेगा, बल्कि आदिवासी स्वशासन की अवधारणा को भी खोखला कर सकता है.
सतर्कता और पुनर्विचार की जरूरत
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ग्राम सभा को सशक्त करना समय की मांग है. लेकिन यह सशक्तिकरण यदि समुदाय को तोड़कर किया जाए, तो उसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है. जरूरत इस बात की है कि सरकार PESA नियमावली 2025 के विवादित प्रावधानों पर पुनर्विचार करे, “पारंपरिक सीमा” को स्पष्ट परिभाषित करे और यह सुनिश्चित करे कि सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार किसी एक टोले का नहीं, बल्कि पूरे गांव समाज का बना रहे.
डिस्क्लेमर : लेखक मांडर के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं
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