- जामताड़ा में एनजीटी की रोक बेअसर
- कस्ता, अफजलपुर, चिचुड़बिल में जारी है बालू उठाव
- बालू का अवैध कारोबार, सरकार को राजस्व का नुकसान
- डीसी-एसपी की निगरानी के बावजूद नहीं थम रहा खनन
Jamtara News: अजय नदी से कथित अवैध बालू खनन का कारोबार एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं. नाला थाना क्षेत्र के चिचुड़बिल कस्ता, अफजलपुर में एनजीटी की रोक के बावजूद बड़े पैमाने पर बालू का उठाव किया जा रहा है.
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स्थानीय जानकारों के मुताबिक, घाट पर मजदूरों, ट्रैक्टरों और मशीनों की मदद से दिन के उजाले में बालू निकाला जा रहा है. खबर प्रकाशित होने पर दो-तीन दिनों के लिए अवैध खनन और परिवहन रोक दी जाती है फिर शुरु कर दिया जाता है.
ग्रामीणों का आरोप है कि अजय नदी से लगातार बालू निकालकर ट्रैक्टरों के जरिए बाहर भेजा जा रहा है. इसके बाद हाइवा से बालू दूसरे स्थानों तक पहुंचाए जाने की बात भी सामने आ रही है. सवाल यह है कि जब अवैध खनन पर रोक के निर्देश हैं, तो फिर घाट से खुलेआम बालू उठाव कैसे जारी है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से चल रहे इस कारोबार से नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है. लगातार खनन से नदी की तलहटी और जलधारा पर असर पड़ने की आशंका है. इसके बावजूद कार्रवाई नहीं होने से प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं.
नाला थाना क्षेत्र के कस्ता, अफजलपुर और चिचुड़बिल से दिन में ट्रैक्टरों के जरिए बालू स्टॉक किया जाता है. जिसे बड़े वाहनों से पश्चिम बंगाल भेजा जाता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला के सभी वरीय अधिकारीयों को पूरी जानकारी है.
जिला खनन पदाधिकारी के निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है. जिले में तैनत डीसी और एसपी तेज तर्रार माने जाते हैं. इसके बाद भी प्रशासनिक तंत्र का बालू के अवैध खनन रोक पाने में विफल होना कई सवाल खड़े करता है.
चिचुड़बिल घाट विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो के विधानसभा क्षेत्र में आता है. उनके आवास से करीब 17-18 किलोमीटर की दूरी पर बालू खनन का खेल चल रहा है.
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मिली सूचना के अनुसार जिला खनन टास्क फोर्स की बैठकों में अवैध खनन रोकने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग नजर आ रही है. अगर निगरानी प्रभावी है, तो फिर नदी घाट तक लगातार पहुंच रहे वाहनों और मशीनों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन कानून लागू होने के बाद से राज्य को आर्थिक मोर्चे पर राजस्व जुटाने की चुनौती है. खनिज-युक्त भूमि पर सेस लगाने पर रोक लग चुका है. राज्य में हो रहे बालू के अवैध करोबार से राज्य सरकार को राजस्व नहीं मिल रहा है.
राजस्व सरकार की विकास योजनाओं में मददगार हो सकता है. सवाल यह उठता है इस कारोबार को कौन संरक्षण दे रहा है. अवैध खनन को संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई कब होगी? यह बड़ा सवाल खड़ा होता है.
दूसरी ओर नदी और पर्यावरण पर भी इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. नदी की जल संग्रहण क्षमता भी घटती है. राज्य के लिए अपने प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व जुटाना महत्वपूर्ण है, लेकिन अवैध उठाव की शिकायतें इस व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं.
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