अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट और कोलकाता हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद चुनाव आयोग की साख बिल्कुल समाप्त हो गई है. वोट चोरी के आरोप पहले जो विपक्ष लगाता था, वह अब लोगों के जुबान पर है. लोग यह मानने लगे हैं कि चुनाव आयोग की वजह से ही भाजपा चुनावों में जीत दर्ज कर रही है. भाजपा के समर्थक भी इस बार सख्ती से बचाव नहीं कर पा रहे हैं. उसके प्रवक्ता टीवी पर गुस्सा करने लगे हैं.
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चुनाव आयोग के अंदरखाने उभरे विवाद के सार्वजनिक होने के बाद लोग अब आयोग को स्वतंत्र संस्था मानने को तैयार नहीं हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त को कानून से बाहर किये जाने के मोदी सरकार के फैसले पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई गड़बड़ियों के लिए लोग मोदी, शाह व उनकी सरकार को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. कह रहे हैं कि गड़बड़ियां और मनमानी करने के लिए ही उन्हें छूट दी गई.
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ज्ञानेश कुमार की मनमानी की बात सामने आने के बाद समूचा विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग कर रहा है. कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस्तीफे की मांग और आंदोलन की चेतावनी दी है. जबकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अब तक किसी आंदोलन की धमकी नहीं दी है. हां, कार्रवाई की मांग जरूर की है. पर सिर्फ ज्ञानेश कुमार पर नहीं, बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी.
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इन सबके बीच अब यह सवाल खड़ा होने लगा है कि अगर आने वाले कुछ महीनों के बाद जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उसमें भाजपा जीत दर्ज करती है, तो क्या होगा? दरअसल, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता समाप्त होने के बाद अब शायद ही कोई भी यह विश्वास करेगा कि भाजपा की जीत मोदी, शाह और योगी के चेहरे की जीत है. लोग यही कहेंगे कि वोट चोरी की जीत है. ऐसे में भाजपा चुनाव जीतकर भी जनता की नजर में हार जायेगी. और अगर हार जाती है तो आम लोग यही कहेंगे कि खुलासों के बाद वोट चोरी नहीं कर सके, इसलिए हार गए.
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