आज छात्र सड़कों पर हैं. पढ़े-लिखे हैं. भविष्य देख सकते हैं. इसलिए युवा गुस्से में हैं. गुस्सा सिर्फ सरकारी नौकरी में घपले-घोटाले से नहीं है. असल में उनको गुस्सा इस बात से है कि वह बेकार हैं और अगले कुछ सालों में उनकी पीढ़ी इसी हाल में जीते-जीते बोझ बन जाएगी. झारखंड की ही बात करें, तो नीचे के आंकड़े को देखें, आपको पता चलेगा यह सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि बारूद है.
झारखंड में युवा और नौकरी का हाल
| झारखंड की कुल आबादी | 3.30 करोड़ |
| 20 से 35 साल के युवा | 1.25 करोड़ |
| झारखंड में सरकारी नौकरी | 3.51 लाख |
| कितने पद पर कर्मी कार्यरत | 1.87 लाख |
| कितने पद खाली है | 1.64 लाख |
| सरकार में अस्थायी पद | करीब 1.00 लाख |
सत्ता इस बारूद की गंध को नहीं पहचान पा रही है. अभी जो छात्रों गुस्से में हैं, वह सिर्फ कहने को सरकारी नौकरी में बेईमानी की वजह से दिख रहे हैं. पर असल कारण यह नहीं है. क्योंकि सरकारी नौकरी है ही कितनी? महज 3.51 लाख. इसमें अस्थायी पदों (करीब 1.00 लाख) को जोड़ दें तो 4.15 लाख. स्थायी पदों में भी सिर्फ 1.64 लाख पद ही खाली है. और झारखंड में 20-35 साल के युवाओं की संख्या कितनी है? 1.25 करोड़.
असल समस्या यह है कि इन 1.25 करोड़ युवाओं के लिए सरकार ने क्या किया? सरकार क्या कर रही है ? और सरकार क्या कर सकती है. पिछले 26 सालों में झारखंड में कोई बड़ा उद्योग नहीं लगा. डिग्री उद्योग जरूर लगा. इंजीनिरिंग कॉलेज, प्राइवेट यूनिवर्सिटीज खुले. छात्रों को डिग्री मिली. पर उनके लिए जॉब तो है ही नहीं. क्योंकि जॉब आयेगा, उद्योग-धंधों से. कल-कारखानों से. पर्यटन से. स्वरोजगार से. सरकारें आयीं-गयीं, पर इन सभी क्षेत्रों में कुछ खास नहीं हुआ. क्यों नहीं हुआ? इसका जवाब है भ्रष्ट तंत्र, बुजुर्ग नेतृत्व, अदूरदर्शी योजनाएं और बिना नौकरी वाले मुद्दों पर चुनाव जीतना.
ये जो 1.25 करोड़ की युवा आबादी है यह 15-25 साल के बाद बुजुर्ग होने लगेंगे. इनकी जिंदगी बेकारी में कटी और अगले कुछ सालों में ये बोझ बन जायेंगे. युवाओं को यह अंधियारा दिख रहा है और असल संकट भी यही है. इसी संकट की वजह से युवा फ्रस्टेशन में हैं. आज उनके सामने पेपर लीक का मुद्दा आया है तो वह उबल पड़े हैं. सड़क पर आ गए हैं. यह सिर्फ एक ट्रिगर प्वाइंट है. आगे कोई और मुद्दा आ जायेगा.
फिर सरकार करे तो क्या करे? सरकार और उसके नुमाइंदों को यह समझना होगा कि आप जो भी योजना बनाते हैं, उसके केंद्र में रोजगार हो. हर योजना रोजगार के लिए बने. सरकारी खजाने का हर रुपया रोजगार के लिए खर्च हो. चाहे सरकार फैक्ट्री लगाये, पर्यटन उद्योग को खड़ा करे, स्वास्थ्य सुविधाओं का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करे. जो रोजगार दे रहे हैं, उन्हें सुविधाएं दें. ऐसा ना हो कि कोई रोजगार पैदा करना चाहता है और भ्रष्ट तंत्र से काम ही ना करने दे.
अगर सरकार यह सब नहीं करती हैं, तो तय मानिए आज पेपर लीक या जेपीएससी-जेएसएससी घोटाले को लेकर युवा सड़क पर हैं, तो कल किसी और मुद्दे को लेकर. और अगर वो खामोश हो गए, तो यह किसी भी राज्य या देश के लिए सबसे खराब हालात होंगे.
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