Ranchi News: नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह से परेशान होकर तत्कालीन वित्त सलाहकार विनय कुमार वर्मा ने इस्तीफा दिया था. उन्होंने राज्यपाल सचिवालय और उच्च शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव को भेजे गये पत्र में इस बात का उल्लेख किया है. पूर्व वित्त सलाहकार ने अपने पत्र में कुलपति द्वारा गाली गलौज करने का भी उल्लेख किया है.
तत्कालीन वित्त सलाहकार ने पत्र में लिखा है कि वह विश्वविद्यालय में 10-12-2025 से 16-9-2025 तक कार्यरत रहे. इस अवधि में उन्होंने दो कुलपतियों के साथ काम किया. प्रमंडलीय आयुक्त सह कुलपति बाल किशुन मुंडा के साथ काम करने का अच्छा अनुभव रहा. लेकिन कुलपति दिनेश सिंह की तानाशाही और भ्रष्ट कार्यशैली से परेशान होकर उन्होंने वित्त सलाहकार के पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि त्यागपत्र में इस्तीफे का कारण निजी बताया.
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राज्यपाल सचिवालय और उच्च शिक्षा विभाग को भेजे गये पत्र में कहा कि दिनेश सिंह ने कुलपति का प्रभार लेते ही वित्तीय मामलों से संबंधित फाइलों को वित्त शाखा में भेजना बंद कर दिया. कुलपति ने तत्कालीन कुलसचिव एंव वर्तमान सीसीडीसी को अपने कमरे में बैठाकर मनमाने ढंग से टेंडर प्रकाशित करवाने लगे. कुलपति ही डिक्टेट कर फाइलें लिखवाते थे.
विश्वविद्यालय के कामकाज में नियमों परिनियमों के उल्लंघन का मुद्दा उठाने वाले शिक्षकों को दूर दराज के इलाके में पदस्थापित कर दिया जाता था. डॉक्टर रवि शंकर इसके ज्वलंत उदाहरण हैं. राज्यपाल के आदेश के आलोक में डॉक्टर रविशंकर को परीक्षा नियंत्रक के पद पर नियुक्त किया गया था. लेकिन नियमों के उल्लंघन पर आपत्ति करने की वजह से उन्हें इस पद से हटा दिया गया. साथ ही उनका तबादला दूर के कॉलेज में कर दिया.
इसके बाद डॉक्टर अजीत सेठ को अपनी ही मर्जी से परीक्षा नियंत्रक के पद पर पदस्थापित कर दिया. इसपर राज्यपाल की सहमति नहीं ली. परीक्षा नियंत्रक के पद पर अजीत सेठ के पदस्थापित करने के बाद डॉक्टर गौरव प्रसाद को परीक्षा नियंत्रक के OSD के पद पदस्थापित कर दिया. जबकि OSD का पद सृजित ही नहीं है.
शिकायती पत्र में यह भी कहा गया कि कुलपति द्वारा संजय कुमार सिंह, वेद प्रकाश शुक्ला, राजीव मुखर्जी आदि के उकसाकर पदाधिकारियों व कर्मचारियों को डराया धमकाया जाता है. गलत आरोप लगवाया जाता है. उनके खिलाफ भी गलत आरोप लगवाये गये थे.
पूर्व वित्त सलाहकार ने अपने शिकायती पत्र में लिखा है कि कुलपति की बोली बहुत खराब है. वह गाली गलौज भी करते हैं. लेकिन डर से कोई नहीं बोलता है. फाइलों में वित्तीय नियमों के उल्लंघन का उल्लेख करने से कुलपति को गुस्सा आता है. विश्वविद्यालय की वैधानिक समितियों की बैठक में भी कोई डर से नहीं बोलता है. बैठकों की कार्यवाही भी उन्हीं के अनुसार तैयार कर उसपर दस्तखत करवा लिया जाता है.
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