Ranchi : वर्ष 2012 में झारखंड पुलिस में दारोगा नियुक्ति की प्रक्रिया शुरु हुई थी. उस वक्त झारखंड में अर्जुन मुंडा की सरकार थी और राज्य पुलिस के प्रमुख के पद पर जीएस रथ थे. यानी जीएस रथ राज्य पुलिस के डीजीपी थे. उनके कार्यकाल में दारोगा, सार्जेंट व होमगार्ड के लिए कंपनी कमांडर की नियुक्ति का विज्ञापन निकला था.
करीब डेढ़ साल तक चली नियुक्ति प्रक्रिया के बाद फरवरी 2012 में सफल अभ्यर्थियों की सूची वेबसाइट पर जारी किया गया था. इस नियुक्ति में मेरिट के बदले प्रेफरेंस को प्राथमिकता देने का एकतरफा फैसला लिया गया, जिससे बहुत सारे अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हुआ. जबकि बहुत सारे अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचा और यह सब हुआ तब के डीजीपी जीएस रथ के एकतरफा फैसले की वजह से.
अब तक आपने पढ़ा....
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-01: विधानसभा से हुई शुरूआत
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-02: बाबूलाल ने जिसे जबरन JPSC सदस्य बनाया वही निकला किंगपिन
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार 3 JPSC अध्यक्ष ख्यांग्ते समेत सारे सदस्य संदेह के दायरे में
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-4: सीबीआई जांच में रोड़े अटकाती रही JPSC
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-5 : जांच कोई भी एजेंसी करे नौकरी किसी की नहीं जाती है
झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-6: JET में जो हुए फेल, वे भी बन गए विवि में लेक्चरर.
इस दारोगा नियुक्ति में बड़े पैमाने पर अनियमितता के आरोप लगे. अभ्यर्थियों ने हाई कोर्ट में 25 रिट याचिकाएं दाखिल की. जीएस रथ के बाद राजीव कुमार राज्य पुलिस के डीजीपी बने. उन्होंने पूरे मामले की समीक्षा करने के बाद जुलाई 2013 में पूर्व डीजीपी जीएस रथ के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की था. साथ ही उन्होंने मेघा सूची को नये सिरे से प्रकाशित करने और वैसे उम्मीदवारों को नियुक्त करने की अनुशंसा की, जिन्हें पूर्व डीजीपी जीएस रथ के फैसले की वजह से अयोग्य करार दिया गया था.
उल्लेखनीय है कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान कुछ दिनों के लिए झारखंड में राष्ट्रपति शासन भी लगा था. अनियमितता की शिकायत राज्यपाल के सलाहकार के विजय कुमार के पास भी पहुंची थी. के विजय कुमार ने मामले की जांच का आदेश तत्कालीन गृह सचिव को दिया था. आरोपों में कहा गया था कि तत्कालीन डीजीपी जीएस रथ ने मेरिट के बदले प्रेफरेंस के आधार पर रिजल्ट बनाने का फैसला लिया. इससे बहुत सारे अभ्यर्थियों को बड़ा नुकसान हुआ और बहुतों को फायदा पहुंचाया गया.
जांच के दौरान झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) से भी मंतव्य मांगा गया था. जेपीएससी ने अपने मंतव्य में कहा था कि मेरिट के बदले प्रेफरेंस को तरजीह देना नियम संगत नहीं है. इस पर तत्कालीन डीजीपी जीएस रथ ने जांच कमेटी के समक्ष कहा था कि प्रेफरेंस के आधार पर मेघा सूची बनाने का फैसला चयन समिति की बैठक में लिया गया था. जबकि चयन समिति के सदस्यों ने उनके इस बयान पर कहा था कि मेघा सूची बनाने से पहले समिति की कोई बैठक नहीं हुई थी. तत्कालीन डीजीपी ने एक तरफा फैसला लिया.
इस तरह जांच समिति की रिपोर्ट और डीजीपी राजीव कुमार की अनुशंसा के बाद भी सरकार ने जीएस रथ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. न ही मेघा सूची का दुबारा प्रकाशन किया गया. समय के साथ यह मामला खत्म हो गया. अभ्यर्थियों को कभी न्याय नहीं मिला.
