Ranchi News : सरकारी नौकरी किसी व्यक्ति के लिए सिर्फ रोजगार नहीं होती. उसके साथ परिवार की उम्मीदें, बच्चों का भविष्य, बहन की शादी और वर्षों की मेहनत जुड़ी होती है. झारखंड में नियुक्ति को लेकर जारी विवाद के बीच पलामू के अमित कुमार और राजेंद्र कुमार की कहानी उन कर्मचारियों की पीड़ा सामने लाती है, जिन्होंने बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपने जीवन के कई फैसले लिए, लेकिन अब एक सरकारी अधिसूचना के बाद फिर से अनिश्चितता के दौर में पहुंच गए हैं.

राजेंद्र कुमार
पलामू के डालटनगंज निवासी अमित कुमार का चयन JSSC-CGL परीक्षा के माध्यम से हुआ था. इसके बाद वह ग्रामीण कार्य विभाग में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर (ASO) के पद पर सेवा दे रहे थे. इससे पहले अमित वर्ष 2018 से रेलवे में कार्यरत थे और ASO बनने से पहले ट्रेन मैनेजर के पद पर नौकरी कर रहे थे. रेलवे की नौकरी छोड़कर झारखंड सरकार की नौकरी चुनना उनके लिए आसान फैसला नहीं था. अमित का कहना है कि वह अपने राज्य में रहकर सेवा करना चाहते थे और परिवार के करीब रहना चाहते थे. उन्हें उम्मीद थी कि झारखंड में नौकरी करने से परिवार की जिम्मेदारियां बेहतर ढंग से निभा पाएंगे.
अमित के पिता पलामू में प्लंबर का काम करते हैं. उन्होंने अपने बच्चों को मेहनत से पढ़ाया और इस काबिल बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. अमित के बड़े भाई पंचायत सचिव हैं. खुद अमित के परिवार में भी कई जिम्मेदारियां हैं. उनकी बहन की शादी होनी है और उनका करीब दो साल का छोटा बच्चा है. अमित कहते हैं कि जब मैं झारखंड में नौकरी करने आया तो लगा था कि अब बहन की शादी अच्छे से कर पाऊंगा और परिवार के लिए कुछ कर सकूंगा. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि सारे सपने टूट गए.
अमित की मांग है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो सरकार निष्पक्ष जांच कराए. वह हर जांच के लिए तैयार हैं. उनका कहना है कि अगर मैं भी गलत तरीके से नियुक्त हुआ हूं तो मुझे नौकरी से बाहर कर दीजिए, जरूरत हो तो मेरे खिलाफ कार्रवाई भी कीजिए. लेकिन पहले मेरी जांच तो हो.

राजेंद्र कुमार
वहीं राजेंद्र कुमार की कहानी भी संघर्ष से भरी है. वह ASO बनने से पहले रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट के रूप में सेवा दे चुके हैं. सरकारी सेवा में आगे बढ़ने की कोशिश उन्होंने वर्षों तक जारी रखी. वर्ष 2007 की 10वीं JPSC में वह इंटरव्यू तक पहुंचे. 13वीं JPSC में कुछ अंकों से चयन से चूक गए. इसके अलावा JPSC की प्रारंभिक परीक्षाओं में सफलता हासिल की और 67वीं BPSC की मुख्य परीक्षा भी लिखी.
राजेंद्र बताते हैं कि उनके पिता ने सब्जी बेचकर बच्चों को पढ़ाया. मां गृहिणी हैं. चार भाई-बहनों में वही नौकरी करते हैं और बाकी सभी भाई उनसे छोटे हैं. ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. शादी की बात भी चल रही थी, लेकिन अब नौकरी पर संकट के बाद वह खुद से पूछ रहे हैं कि अब हमारा भविष्य क्या होगा?
अमित और राजेंद्र की कहानी अलग होते हुए भी एक सवाल पर आकर मिलती है कि अगर भर्ती में गड़बड़ी हुई है तो दोषी की पहचान कर कार्रवाई हो, लेकिन बिना जांच उन लोगों का भविष्य क्यों खत्म किया जाए, जिन्होंने अपनी मेहनत और उम्मीदों के साथ नौकरी स्वीकार की? आज एक तरफ अमित के सामने छोटे बच्चे और बहन की शादी की चिंता है, तो दूसरी तरफ राजेंद्र के सामने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी और अपना घर बसाने का सपना. दोनों की सरकार से एक ही अपील है कि दोषी को सजा दीजिए, लेकिन जांच से पहले किसी निर्दोष के परिवार की उम्मीदें मत छीनिए.
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