38 साल पुराना इंटरव्यू- हमारी लड़ाई 'दिकुओं' से नहीं शोषकों से है: शिबू सोरेन
शिबू सोरेन आदिवासियों के दूसरे 'मरांग गोमके' हैं. आज भी आदिवासियों के बीच वह मसीहा की तरह लोकप्रिय हैं. अपने लड़ाकू तेवर के कारण वह मशहूर रहे हैं. श्री सोरेन ने राजनीति पढ़-लिखकर नहीं सीखी, उनका जीवन ही कठिनाइयों के बीच आरंभ हुआ. उनके अध्यापक पिता स्वतंत्रता की लड़ाई में काफी सक्रिय रहे थे. 1957 में महाजनों ने उनकी हत्या कर दी. तब वह छठी कक्षा में थे. सोरेन सात भाई-बहन थे. पिता के न रहने पर परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गयी.
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